उच्चतम न्यायालय ने Mohammed Enterprises Tanzania Ltd. बनाम Farooq Ali Khan and Others, [2025] 1 S.C.R. 177 के मामले में Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 60(5)(c) की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस प्रकरण में उच्च न्यायालय द्वारा कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया गया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने विधिसम्मत अनुशासन के विरुद्ध पाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि IBC के अंतर्गत प्रारंभ की गई कार्यवाही को समयबद्ध तरीके से पूर्ण करना आवश्यक है और अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित रखा जाना चाहिए।
इस मामले में CIRP की प्रक्रिया 26 अक्टूबर 2018 को प्रारंभ हुई थी और अपीलकर्ता की समाधान योजना वर्ष 2020 में स्वीकृत हो चुकी थी। इसके बावजूद उच्च न्यायालय ने देरी से दायर याचिका को स्वीकार कर लिया जो कि न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Insolvency and Bankruptcy Code स्वयं में एक पूर्ण और स्वतंत्र संहिता है जिसमें नियंत्रण समाधान और अपील के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएँ हैं अतः अन्य अदालतों द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप वांछनीय नहीं है।
न्यायालय ने दोहराया कि संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को जो पर्यवेक्षणीय और पुनरावलोकन शक्तियाँ प्राप्त हैं उनका प्रयोग अत्यंत सावधानी और न्यायिक विवेक के साथ होना चाहिए। इस मामले में हस्तक्षेप न केवल प्रक्रिया में अनुचित देरी का कारण बना बल्कि IBC के उद्देश्य को भी विफल करता है जो कि एक त्वरित और प्रभावी समाधान प्रदान करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Insolvency and Bankruptcy Code का उद्देश्य कॉरपोरेट दिवालियापन की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है जिससे देश की आर्थिक प्रणाली सशक्त हो सके। कोड के तहत कर्जदाताओं को सशक्त किया गया है समाधान की प्रक्रिया को एक निश्चित समय सीमा में पूरा करना अनिवार्य बनाया गया है और अपील तथा समीक्षा के लिए विशिष्ट न्यायिक मंच प्रदान किए गए हैं।

Mohammed Enterprises Tanzania Ltd. बनाम Farooq Ali Khan and Others, [2025] 1 S.C.R. 177 का यह निर्णय भारत में IBC के तहत कार्यवाही को निष्पक्ष और दक्ष बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बन गया है। इससे न्यायपालिका के भीतर भी यह संदेश गया है कि आर्थिक और वाणिज्यिक मामलों में अनुशासन और विधिक प्रक्रिया का सम्मान अत्यंत आवश्यक है और न्यायिक हस्तक्षेप को तर्कसंगत और सीमित दायरे में रखा जाना चाहिए।