मध्यस्थता निर्णय की वास्तविक सूचना से परिसीमा प्रारंभ – औपचारिक सेवा की आवश्यकता नहीं: धारा 14(2), मध्यस्थता अधिनियम, 1940 तथा अनुच्छेद 119(ख), परिसीमा अधिनियम, 1963 की व्याख्या”

विधि विशेष

KRISHNA DEVI @ SABITRI DEVI (RANI) M/S S.R. ENGINEERING CONSTRUCTION vs. UNION OF INDIA & ORS.

SCR Citation:     [2025] 1 S.C.R. 81

आज हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की, 

जिसने भारत के मध्यस्थता कानून में ‘सूचना’ यानी Notice शब्द की जड़ तक जाकर उसकी असल परिभाषा बताई। 

ये फैसला सिर्फ एक तकनीकी मुद्दे तक सीमित नहीं था – 

बल्कि इसने तय किया कि कानून में ‘सूचना’ का मतलब क्या होता है? 

क्या वह सिर्फ एक काग़ज़ है, जो पोस्ट ऑफिस से आता है? 

या फिर अगर किसी पक्ष को असल में जानकारी मिल जाए, तो वो भी ‘सूचना’ मानी जा सकती है?”

“तो चलिए पहले समझते हैं कि मामला है क्या। 

यह विवाद जुड़ा हुआ है मध्यस्थता अधिनियम, 1940 से — 

जिसकी धारा 14(2) और धारा 17 इस केस का केंद्र बिंदु बनीं।

अब अगर आपको Arbitration कानून की मूलभूत जानकारी नहीं है, 

तो थोड़ा सा बुनियादी संदर्भ देना जरूरी होगा।”

“जब दो पक्षों के बीच विवाद होता है और वे अदालत नहीं जाकर किसी तीसरे निष्पक्ष व्यक्ति यानी मध्यस्थ (Arbitrator) से समाधान चाहते हैं, 

तो उसे कहते हैं मध्यस्थता।

मध्यस्थ एक निर्णय (Award) देता है – और वह निर्णय तब तक लागू नहीं होता 

जब तक उसे कोर्ट में दाखिल न किया जाए।

अब जैसे ही वो Award कोर्ट में दाखिल होता है, 

कानून कहता है कि दूसरे पक्ष को इसकी सूचना दी जाए – 

और यदि वह पक्ष इस निर्णय से सहमत नहीं है, 

तो 30 दिनों के अंदर अपनी आपत्तियाँ दाखिल कर सकता है।”

“अब इस मामले में क्या हुआ?

10 नवंबर 2022 को एक पक्ष ने कोर्ट में आवेदन दिया 

कि मध्यस्थ का निर्णय लागू कर डिक्री पारित की जाए। 

मतलब वो चाहता था कि अब ये Award अदालत के आदेश की शक्ल ले ले।

लेकिन कोर्ट ने यह आवेदन खारिज कर दिया। 

क्यों? 

क्योंकि कोर्ट का कहना था कि अभी 30 दिन पूरे नहीं हुए हैं, 

जिनमें दूसरा पक्ष अपनी आपत्ति दाखिल कर सकता है।

अब ये 30 दिन गिने कहाँ से गए? 

18 नवंबर 2022 से — 

जब औपचारिक रूप से दूसरे पक्ष को इस Award की ‘सूचना’ दी गई थी। 

कोर्ट ने कहा – ‘जब तक Notice serve नहीं हुआ, तब तक Limitation शुरू नहीं होती।’”

“यहीं से शुरू हुआ असली कानूनी विवाद – 

क्या सूचना का मतलब सिर्फ वो Notice है जो औपचारिक रूप से सर्व किया जाए?

या फिर… 

अगर पक्षकार को वास्तविक जानकारी मिल गई है कि Award दाखिल हो चुका है, 

तो क्या उसी दिन से 30 दिन की गिनती शुरू हो जाती है?”

“यह मामला Trial Court से होते हुए High Court गया। 

लेकिन High Court ने भी Trial Court की बात को ही सही माना।

फिर यह मामला पहुँचा भारत के सर्वोच्च न्यायालय – Supreme Court के सामने।

और यहाँ से शुरू हुआ एक ऐतिहासिक मोड़, 

जिसने कानून की व्याख्या को वास्तविक जीवन से जोड़कर देखा।”

“Supreme Court ने अपनी विवेचना में बहुत साफ़-साफ़ कुछ बातें कहीं:

1 सबसे पहली बात – 

धारा 14(2) में सिर्फ ‘Notice देने’ की बात कही गई है, 

यह नहीं कहा गया कि उस Notice की ‘सर्विस’ यानी formal delivery जरूरी है।

2 दूसरी बात – 

इस केस में 21 सितंबर 2022 को ही जिला न्यायालय ने एक आदेश पारित किया था, 

जिसमें कहा गया कि जैसे ही शेष शुल्क मध्यस्थों को दे दिए जाएँगे, Award प्रस्तुत कर दिया जाएगा।

अब यह आदेश प्रतिवादी पक्ष को सुनाया गया था — 

जिससे उन्हें पूरी जानकारी हो गई थी कि Award तैयार है और दाखिल होने जा रहा है।

तो Supreme Court ने कहा – 

यह जो 21 सितंबर का आदेश था, 

वो स्वयं में ही पर्याप्त सूचना है।

3 तीसरी बात – 

18 नवंबर को जो औपचारिक Notice भेजा गया, 

उसकी कोई स्वतंत्र कानूनी महत्ता नहीं रह जाती, 

क्योंकि पक्ष को पहले ही सब कुछ पता चल चुका था।

इसलिए कोर्ट ने कहा – 

Limitation की 30 दिन की अवधि 21 सितंबर से शुरू मानी जाएगी, 

जो कि 20 अक्टूबर को समाप्त हो चुकी थी।”

[Application Found Valid]

“अब इस विश्लेषण के आधार पर Supreme Court ने यह तय किया कि 

10 नवंबर 2022 को जो याचिका दायर की गई थी, 

वह पूरी तरह वैध, समयबद्ध, और कानूनन सही थी।

इसलिए निचली अदालतों द्वारा की गई अस्वीकृति विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण थी। 

Supreme Court ने इस Impugned Order को निरस्त कर दिया।”

“अब चलिए देखते हैं इस निर्णय से हमें क्या सीखने को मिला:

पहला – 

अब से सूचना का मतलब सिर्फ औपचारिक Notice नहीं, 

बल्कि अगर पक्षकार को वास्तविक जानकारी मिल गई है — 

तो वही सूचना मानी जाएगी।

दूसरा – 

यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में व्यावहारिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। 

यानी तकनीकी औपचारिकताओं के बजाय वास्तविकता को देखा जाएगा।

तीसरा – 

इस निर्णय ने ‘सतर्क पक्षकार’ के सिद्धांत को मजबूत किया है। 

अब कानून मानता है कि – 

“अगर आप को जानकारी है, तो आपको क़दम उठाना चाहिए। 

कानून उन लोगों का साथ नहीं देता जो जान-बूझकर देरी करते हैं।”

चौथा – 

अब ‘सूचना’ शब्द को सिर्फ एक तकनीकी औपचारिकता नहीं, 

बल्कि न्यायिक जागरूकता का प्रतीक माना जाएगा।”

“तो दोस्तों, 

इस फैसले ने न केवल ‘सूचना’ की परिभाषा को नया अर्थ दिया, 

बल्कि यह भी बता दिया कि 

कानून अब केवल फॉर्मलिटी पर नहीं, बल्कि जागरूकता और वास्तविक ज्ञान पर काम करता है।

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