BANK OF INDIA & ORS. बनाम MUTHYALA SAIBABA SURYANARAYANA MURTHY & ANR.
SCR उद्धरण: [2025] 4 S.C.R. 120
निर्णय दिनांक: 18 मार्च 2025
न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता
प्रकरण प्रकार: सिविल अपील /3829/2025
निर्णय: अपील स्वीकार की गई
न्यूट्रल सिटेशन: 2025 INSC 373
मुख्य बिंदु (हेडनोट):
बैंक ऑफ इंडिया (अपीलकर्ता संख्या 1) ने अपने पात्र सेवानिवृत्त कर्मचारियों से Bank of India (Employees’) Pension Scheme, 1995 के अंतर्गत विकल्प आमंत्रित किए। पहले प्रतिवादी, जो अपीलकर्ता बैंक के पूर्व कर्मचारी थे, यद्यपि योजना के लिए पात्र थे, परंतु उन्होंने निर्धारित समय-सीमा के भीतर विकल्प प्रस्तुत नहीं किया।
प्रतिवादी अमेरिका यात्रा पर गए हुए थे और परिपत्र जारी होने के एक सप्ताह बाद भारत लौट आए थे, जो कि अंतिम तिथि से काफी पहले था। फिर भी उन्होंने विकल्प प्रस्तुत नहीं किया। चार माह बाद उन्होंने पूर्व कर्मचारियों से योजना की जानकारी मिलने का दावा करते हुए विकल्प प्रस्तुत किया, जिसे बैंक ने अस्वीकार कर दिया।
प्रतिवादी की याचिका एकल न्यायाधीश ने खारिज कर दी, परंतु उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने उसे स्वीकार कर लिया।
निर्णय:
जब कोई नीति विषयों के हित में बनाई जाती है परंतु विकल्प की अंतिम तिथि निर्धारित करती है, तो यह कानून नहीं हो सकता कि कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा अनुसार उस लाभ को अनिश्चित समय में प्राप्त कर सके।
बैंक ने योजना की जानकारी व्यापक स्तर पर स्थानीय एवं राष्ट्रीय समाचारपत्रों तथा शाखाओं के माध्यम से दी थी। प्रतिवादी, यद्यपि विदेश में थे, फिर भी वे अपने हित से जुड़ी जानकारी के प्रति सतर्क नहीं थे।

उन्होंने निर्धारित तिथि तक विकल्प का प्रयोग नहीं किया, अतः उनके किसी विधिक अधिकार के अतिक्रमण का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
जो हानि उन्हें हुई, वह विधिक दृष्टिकोण से गलत नहीं मानी जा सकती, क्योंकि स्थिति के लिए वही स्वयं उत्तरदायी हैं।
उनके पास ऐसा कोई विधिसंरक्षित अधिकार नहीं था, जिसे अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मैंडेमस द्वारा लागू कराया जा सके। अतः याचिका पोषणीय नहीं थी, और एकल न्यायाधीश द्वारा उसे खारिज किया जाना उचित था।
खंडपीठ यह समझने में असफल रही कि Article 226 की रिट शक्तियाँ आलसी, विलंबशील या निष्क्रिय व्यक्तियों की सहायता के लिए नहीं होतीं। जब विकल्प प्रस्तुत करने की प्रक्रिया एक पारस्परिक समझौते के अंतर्गत होती है, तो उसमें सहानुभूति, अनुकंपा, कृपा या दया के आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
बैंक द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई मनमानी या अन्यायपूर्णता नहीं पाई गई, अतः खंडपीठ का हस्तक्षेप अवांछनीय था।
विवादित निर्णय रद्द किया गया।