राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद: विधिक उत्तरदायित्व और ऐतिहासिक न्याय

विधिक समाचार

(M. Siddiq (Dead) through LRs बनाम महंत सुरेश दास व अन्य, 2019)
[संविधान पीठ – न्यायमूर्ति रंजन गोगोई (CJI), न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डॉ. डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर]

इस वाद का केंद्रीय मुद्दा अयोध्या नगर में स्थित 1500 वर्ग गज भूमि के स्वामित्व को लेकर था, जिस पर हिंदू पक्ष इसे भगवान श्रीराम का जन्मस्थल मानते हुए “राम जन्मभूमि” के रूप में अपना दावा करता रहा, जबकि मुस्लिम समुदाय ने इस स्थल को ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद मानकर इसके वक्फ होने का अधिकार प्रस्तुत किया।

बहुमत का निर्णय और प्रत्यक्ष निष्कर्ष
सर्वसम्मति से, संविधान पीठ ने यह ठहराया कि यह भूमि एक अविभाज्य संपूर्ण इकाई है, जिसमें बाह्य प्रांगण पर हिंदू समुदाय का अबाध उपासना आधारित कब्जा ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है। न्यायालय ने पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट, ऐतिहासिक यात्रा वृत्तांतों, और मौखिक गवाही के आधार पर यह स्वीकार किया कि 1857 में ब्रिटिशों द्वारा बनाए गए ग्रिल-ब्रिक वॉल के बावजूद हिंदू भक्तों की पूजा-स्थलों पर श्रद्धा और उपस्थिति निर्बाध बनी रही। रामछबूतरा, सीता रसोई और अन्य धार्मिक प्रतीकों के प्रति श्रद्धालुजन का व्यवहार बाह्य प्रांगण पर उनके अधिपत्य को स्थापित करता है।

हालाँकि भीतरी प्रांगण को लेकर दोनों समुदायों के अधिकारों में स्पष्ट संघर्ष रहा। मुस्लिम पक्ष यह नहीं दिखा सका कि 1857 से पूर्व वह संरचना के भीतर विशिष्ट या निरंतर कब्जे में था। जबकि सबूत यह प्रदर्शित करते हैं कि 1857 के पश्चात नमाज़ केवल सीमित अवसरों जैसे कि शुक्रवार को होती थी, और 1949 में मूर्ति स्थापना की घटना से उनका स्वामित्व अवैधानिक रूप से बाधित हुआ। इसके बाद 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद का विध्वंस हुआ, जिसे न्यायालय ने विधिशासन का घोर उल्लंघन माना।

प्रत्येक वाद का विधिक मूल्यांकन
Suit 5, जो कि श्रीरामलला विराजमान और जन्मभूमि (Asthan) द्वारा एक “next friend” के माध्यम से दाखिल किया गया था, विधिक दृष्टि से स्वीकार्य और समयबद्ध माना गया, क्योंकि देवता एक “juristic person” माने गए और उनके लिए न्यायालय में प्रतिनिधित्व संभव था। Suit 4, जो सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा दायर किया गया था, आंशिक रूप से अनुमोदित किया गया क्योंकि यह स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम समुदाय को विधिसम्मत प्रक्रिया के बिना उनकी नमाज़गाह से वंचित किया गया था। दूसरी ओर, Suit 3, जो निर्मोही अखाड़ा द्वारा अपनी “shebait” स्थिति को स्थापित कर मंदिर प्रबंधन का दावा करता था, समयसीमा के बाहर होने के कारण अस्वीकार कर दिया गया। फिर भी, न्यायालय ने उनके ऐतिहासिक योगदान को मान्यता देते हुए मंदिर प्रबंधन ट्रस्ट में उन्हें उचित भूमिका देने का निर्देश दिया। Suit 1, जो एक भक्त द्वारा उपासना के अधिकार की रक्षा हेतु था, वैध माना गया किंतु प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय और उसकी त्रुटियाँ
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विवादित भूमि को तीन बराबर भागों में विभाजित करना, विधिक रूप से अवैध ठहराया गया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह प्रकरण कोई विभाजन वाद नहीं था, और न्यायालय को केवल उन राहतों तक सीमित रहना चाहिए जो प्रार्थनापत्रों में विनिर्दिष्ट की गई थीं। Order VII Rule 7, CPC के अनुसार भी न्यायालय को वाद की मूल संरचना को पुनर्निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।

संवैधानिक और विधिक मूल्य पर बल
न्यायालय ने यह दोहराया कि विवाद के केंद्र में भले ही धार्मिक विश्वास हो, किंतु भूमि स्वामित्व का निर्धारण केवल साक्ष्य और विधिक सिद्धांतों के आधार पर ही हो सकता है। आस्था और विश्वास, न्यायालय में स्वामित्व के साक्ष्य नहीं बन सकते। साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग कर न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय को वैकल्पिक रूप से पाँच एकड़ भूमि अयोध्या नगर में मस्जिद निर्माण हेतु प्रदान करने का निर्देश दिया, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और मानव गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हो सके।

प्रमुख विधिक उपबंध और व्याख्याएँ
इस मामले में न्यायालय ने अनेक विधिक प्रावधानों को विस्तार से समझाया, जिनमें शामिल हैं:

भारतीय संविधान: अनुच्छेद 142 (संपूर्ण न्याय), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 372 (कानून निरंतरता)

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908: आदेश VII नियम 7

लिमिटेशन अधिनियम, 1908: अनुच्छेद 120, 142, 144

वक्फ अधिनियम, 1995: धारा 3(r)

पूजा स्थलों का विशेष उपबंध अधिनियम, 1991

साक्ष्य अधिनियम, 1872: धारा 110

अंतिम निष्कर्ष और आदेश
न्यायालय ने निर्देश दिया कि Suit 5 के अनुसार विवादित भूमि रामलला विराजमान को प्रदान की जाए, और केंद्र सरकार “Acquisition of Certain Area at Ayodhya Act, 1993” की धारा 6 व 7 के अंतर्गत ट्रस्ट का गठन कर उस स्थल पर मंदिर निर्माण सुनिश्चित करे। साथ ही, मुस्लिम समुदाय को सम्मानपूर्वक वैकल्पिक भूमि का आवंटन किया जाए।यह निर्णय न केवल भूमि विवाद का विधिक समाधान है, अपितु यह न्याय, समानता, सहिष्णुता और विधिशासन के संवैधानिक आदर्शों को साकार करता है।

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