निर्णायक सीमाएं: मध्यस्थीय निर्णय में तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जा सकता

पॉडकास्ट विधिक समाचार

मामला और संदर्भ
Reliance Infrastructure Ltd. v. State of Goa, (2024) 1 SCC 479

उठाया गया मुख्य संवैधानिक/विधिक प्रश्न
क्या मध्यस्थता अधिनियम, 1996 की धारा 34 के अंतर्गत न्यायालय को तथ्यों के पुनः मूल्यांकन का अधिकार है या नहीं? और क्या “patent illegality” के आधार पर निर्णय को चुनौती दी जा सकती है जब वह भारतीय विधि की मौलिक नीति या नैतिकता से टकराता है?

बहुमत निर्णय
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि धारा 34 की सीमाएं अत्यंत संकीर्ण हैं और यह किसी अपीलीय मंच की तरह कार्य नहीं करता। न्यायालय इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है कि हाल के वर्षों में न्यायालयों की यह “disturbing tendency” बन गई है कि वे मध्यस्थीय निर्णयों को तथ्यों का पुनः परीक्षण कर रद्द कर देते हैं, जबकि यह विधिक रूप से अनुमेय नहीं है।

न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि:

  1. न्यायालय धारा 34 के अंतर्गत तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन या साक्ष्यों की पुनः सराहना नहीं कर सकता।
  2. हस्तक्षेप केवल उन्हीं आधारों पर सीमित है जो धारा 34 में दिए गए हैं जैसे कि public policy of India, patent illegality, या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन।
  3. “नैतिकता” के उल्लंघन का अर्थ अब केवल “सबसे मूलभूत नैतिक या न्याय की धारणा” से टकराव तक सीमित है।
  4. यदि निर्णय ऐसा हो कि वह न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर दे, तभी उसे रद्द किया जा सकता है।

अल्पमत विचार
इस निर्णय में कोई अल्पमत मत (Minority View) दर्ज नहीं हुआ। निर्णय एकमत (unanimous) रहा।

प्रासंगिक विधिक प्रावधान

  1. Arbitration & Conciliation Act, 1996, Section 34 – मध्यस्थीय निर्णय को रद्द करने की सीमित शक्ति
  2. Section 18 – पक्षकारों को समान और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
  3. Section 34(2)(a)(iii) – यदि पक्ष को सुनवाई से वंचित किया गया हो तो चुनौती संभव
  4. Section 37 – अपील का अधिकार, लेकिन यह भी सीमित न्यायिक समीक्षा के अधीन है

निर्णय में उल्लिखित पूर्ववर्ती निर्णय और उनका सार (प्रत्येक 2 पंक्तियों में)

  1. Associate Builders v. DDA, (2015) 3 SCC 49
    न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि award केवल उन्हीं आधारों पर रद्द हो सकता है जो ‘public policy of India’ के अंतर्गत आते हैं। इसी आधार पर Reliance के मामले में भी तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन अस्वीकार्य ठहराया गया।
  2. ONGC Ltd. v. Western Geco, (2014) 9 SCC 263
    निर्णय में “fundamental policy of Indian law” की परिभाषा दी गई थी, जिससे स्पष्ट किया गया कि प्रक्रिया में न्याय का उल्लंघन ही हस्तक्षेप का आधार है। इस मामले ने वर्तमान निर्णय की नींव रखी।
  3. Ssangyong Engg. & Construction Co. Ltd. v. NHAI, (2019) 15 SCC 131
    न्यायालय ने कहा कि award केवल तभी रद्द किया जा सकता है जब वह “most basic notions of morality or justice” से टकराए। Reliance मामले में इसी दृष्टिकोण का विस्तार हुआ।

न्यायसम्मत निष्कर्ष
Reliance Infrastructure Ltd. v. State of Goa के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार पुनः यह दृढ़ किया कि मध्यस्थता का सम्मान न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है, और न्यायालयों को अपनी सीमाएं पहचाननी होंगी। तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन केवल अपीलीय मंच के लिए है, न कि धारा 34 के अंतर्गत। यह निर्णय मध्यस्थता निर्णयों की वैधता को संरक्षित रखने हेतु मील का पत्थर है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल गंभीर प्रक्रियात्मक या मूल नीति से टकराने वाले award ही हस्तक्षेप के योग्य हैं।

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