मामला और संदर्भ
Mohit Singhal v. State of Uttarakhand, (2024) 1 SCC 417
उठाया गया मुख्य संवैधानिक/विधिक प्रश्न
क्या अभियुक्तों के कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 107 के अंतर्गत “दुष्प्रेरण” (instigation) की परिभाषा में आते हैं जिससे आत्महत्या हेतु प्रेरित करना सिद्ध होता है, और क्या धारा 306 के अंतर्गत दंडनीय अपराध बनता है?
बहुमत निर्णय
न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की पीठ ने यह निर्णय दिया कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण सिद्ध करने हेतु निम्नलिखित तत्वों का अनिवार्य रूप से पाया जाना आवश्यक है:
(1) अभियुक्त द्वारा किसी प्रकार की instigation होनी चाहिए;
(2) Mens rea अर्थात मानसिक तत्परता होनी चाहिए कि अभियुक्त ने जानबूझकर आत्महत्या के लिए प्रेरित किया;
(3) यह दुष्प्रेरण इतनी तीव्र हो कि मृतक के पास आत्महत्या के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचे;
(4) यह दुष्प्रेरण घटना के निकटतम समय में हुई हो।
वर्तमान मामले में शिकायत और सुसाइड नोट की सामग्री को स्वीकार करने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्तों ने मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। आरोप यह था कि मृतका के पति से उधार की रकम वसूलने हेतु अभियुक्तों ने गाली-गलौच की और बेल्ट से मारा, परंतु यह घटना आत्महत्या की तिथि से दो सप्ताह पूर्व की थी और आत्महत्या के समय के निकट कोई कृत्य आरोपित नहीं है। इसलिए यह आरोप भारतीय दंड संहिता की धारा 107 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
अल्पमत विचार
निर्णय में कोई अल्पमत विचार प्रस्तुत नहीं किया गया, निर्णय एकमत (unanimous) रहा।
प्रासंगिक विधिक प्रावधान
- Section 107 IPC – दुष्प्रेरण का अर्थ है प्रेरित करना, षड्यंत्र रचना, या सहायता करना।
- Section 306 IPC – यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है और कोई अन्य उसे आत्महत्या के लिए उकसाता है, तो वह दंडनीय अपराध है।
निर्णय में उल्लिखित पूर्ववर्ती निर्णय और उनका सार (प्रत्येक 2 पंक्तियों में)
इस निर्णय में किसी पूर्व निर्णय का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, किंतु निर्णय की विधिक कसौटी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों जैसे:
Gurcharan Singh v. State of Punjab, (2017) 1 SCC 433 तथा
Rajesh v. State of Haryana, (2019) 6 SCC 368
में निर्धारित सिद्धांतों पर आधारित है, जिनमें proximate cause और intention to abet की अनिवार्यता को दोहराया गया है।
न्यायसम्मत निष्कर्ष
Mohit Singhal v. State of Uttarakhand में सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए यह निर्णय दिया कि जब तक अभियुक्त द्वारा की गई कार्रवाई आत्महत्या के तत्काल पूर्व समय में नहीं होती और उसमें मानसिक तत्परता स्पष्ट नहीं होती, तब तक उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह निर्णय भारतीय दंड संहिता की धारा 107 व 306 के अंतर्गत अभियोजन की कसौटी को सुस्पष्ट करता है तथा अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।