[2018] 7 S.C.R. 1Government of NCT of Delhi v. Union of India & Another
(Civil Appeal No. 2357 of 2017, Judgment dated 04 July 2018)
मुख्य संवैधानिक प्रश्न:
क्या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को एक पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जा सकता है? उपराज्यपाल क्या निर्वाचित सरकार की सलाह और सहायता से बाध्य हैं या स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं? अनुच्छेद 239AA की व्याख्या किन संवैधानिक सिद्धांतों के तहत की जानी चाहिए?
प्रमुख धाराएं और विधियां:
- संविधान का अनुच्छेद 239AA और 239AB
- संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991
- सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली अधिनियम, 1991
- ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स, 1993
- अनुच्छेद 73, अनुच्छेद 246(4), अनुच्छेद 74, अनुच्छेद 167
- अनुच्छेद 143 पर विशेष संदर्भ निर्णय
प्रमुख उद्धृत निर्णय:
- New Delhi Municipal Council v. State of Punjab, (1997) 7 SCC 339
- Shamsher Singh v. State of Punjab, (1974) 1 SCR 814
- Kesavananda Bharati v. State of Kerala, AIR 1973 SC 1461
- S. R. Bommai v. Union of India, (1994) 3 SCC 1
- Kalpana Mehta v. Union of India, (2018) 7 SCALE 106
बहुमत का निर्णय (Dipak Misra, CJI, A. K. Sikri, A. M. Khanwilkar के साथ):
दिल्ली को वर्तमान संविधानिक व्यवस्था के तहत राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। दिल्ली की स्थिति sui generis है, जिसका अर्थ है कि उसकी संवैधानिक स्थिति अन्य राज्यों से अलग है। उपराज्यपाल राज्यपाल के समान नहीं हैं, बल्कि सीमित अधिकारों के साथ एक प्रशासक हैं।
अनुच्छेद 239AA(4) में “सलाह और सहायता” का तात्पर्य यह है कि उपराज्यपाल, मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं जब तक कि वह राष्ट्रपति के पास मामला भेजने की शक्ति का प्रयोग न करें। यह शक्ति केवल असाधारण परिस्थितियों में ही प्रयोग की जा सकती है, और प्रत्येक निर्णय राष्ट्रपति को भेजने की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार को पुलिस, भूमि और लोक व्यवस्था छोड़कर अन्य विषयों पर कानून बनाने और नीतियाँ निर्धारित करने का अधिकार है। कार्यपालिका शक्ति भी उसी सीमा तक दिल्ली सरकार को प्राप्त है।
संविधान की व्याख्या सार्थक और उद्देश्यपरक (purposive) ढंग से की जानी चाहिए, न कि केवल शाब्दिक रूप में।
अदालत ने संवैधानिक नैतिकता, प्रतिनिधिक शासन, संवैधानिक आचरण, संवैधानिक विश्वास और सहयोगात्मक संघवाद (collaborative federalism) के सिद्धांतों को प्रमुख रूप से महत्व दिया।
उपराज्यपाल के पास “अलग राय” का अधिकार है, परंतु वह केवल विशेष परिस्थितियों में प्रयुक्त किया जाना चाहिए। हर बात पर मतभेद जताना, निर्वाचित सरकार की कार्यपालिका जवाबदेही और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार को अनुच्छेद 239AA के तहत पूर्ण प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त है, जब तक कि कुछ निश्चित विषयों (जैसे भूमि, पुलिस, लोक व्यवस्था) की बात न हो। उपराज्यपाल एक बाध्य प्रशासक हैं जो सामान्यतया मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं। उपराज्यपाल द्वारा हर निर्णय पर विरोध जताना न तो संवैधानिक है और न ही व्यवहारिक।
यह निर्णय संविधान की भावना, लोकतंत्र की आत्मा, और संघीय संतुलन को संरक्षण देने हेतु एक ऐतिहासिक व्याख्या है।