मामला एवं उद्धरण:
Beghar Foundation Through Its Secretary and Anr. v. Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) and Ors., [2021] 1 S.C.R. 681
Review Petition (Civil) Diary No. 45777 of 2018 in Writ Petition (Civil) No. 494 of 2012
निर्णय तिथि: 11 जनवरी 2021
मुख्य संवैधानिक/कानूनी प्रश्न:
क्या आधार अधिनियम, 2016 को अनुच्छेद 110 के तहत ‘मनी बिल’ घोषित करने का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है? क्या इसे मनी बिल की श्रेणी में लाना संविधान के अनुच्छेद 110 की सीमाओं का उल्लंघन है?
बहुमत का निर्णय (न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, अशोक भूषण, एस. अब्दुल नज़ीर, बी.आर. गवई):
बहुमत ने यह कहा कि 26.09.2018 को पारित Puttaswamy (Aadhaar-5J.) निर्णय की समीक्षा की कोई ठोस आधार नहीं है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कानून में परिवर्तन या किसी समकक्ष अथवा वृहद पीठ द्वारा लिया गया बाद का निर्णय, स्वतः समीक्षा का आधार नहीं हो सकता। अतः सभी पुनर्विचार याचिकाएं अस्वीकार की जाती हैं।
अल्पमत का मत (न्यायमूर्ति डॉ. धनंजय वाई. चंद्रचूड़):
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने असहमति व्यक्त की और कहा कि चूंकि Rojer Mathew v. South Indian Bank Ltd. मामले में आधार निर्णय की मनी बिल व्याख्या पर संदेह व्यक्त किया गया है और यह मामला वृहद पीठ के विचाराधीन है, इसलिए इन पुनर्विचार याचिकाओं को तब तक लंबित रखा जाना चाहिए जब तक कि वृहद पीठ निर्णय न दे। उन्होंने यह कहा कि Puttaswamy (Aadhaar-5J.) में अनुच्छेद 110(1) की ‘only’ शब्द की व्याख्या अपर्याप्त है और न्यायिक अनुशासन तथा न्याय के उद्देश्य से समीक्षा आवश्यक है।
प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
अनुच्छेद 110 – मनी बिल की परिभाषा
अनुच्छेद 122 – संसद की कार्यवाही को चुनौती से संरक्षण (केवल प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं तक सीमित)
प्रमुख निर्णय जिनका संदर्भ दिया गया:
- Puttaswamy (Aadhaar-5J.) v. Union of India, (2019) 1 SCC 1
- Rojer Mathew v. South Indian Bank Ltd., (2020) 6 SCC 1
- Kantaru Rajeevaru (Right to Religion), (2020) 9 SCC 121
- S. Nagaraj v. State of Karnataka, 1993 Supp (4) SCC 595
निष्कर्ष:
बहुमत ने पुनर्विचार की अनुमति नहीं दी और याचिकाएं खारिज कर दीं। परंतु न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने तर्कसंगत रूप से यह मत प्रस्तुत किया कि जब एक समान स्तर की संविधान पीठ ने Puttaswamy निर्णय पर संदेह जताया है और मामला वृहद पीठ को संदर्भित किया जा चुका है, तो न्यायसंगत होगा कि समीक्षा याचिकाएं लंबित रखी जाएं। उनका यह मत न्यायिक एकरूपता, विधिक यथास्थिति और संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप है।