उच्चतम न्यायालय ने Bernard Francis Joseph Vaz and Others बनाम Government of Karnataka and Others, [2025] 1 S.C.R. 190 में भूमि अधिग्रहण और प्रतिकर में देरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस मामले में अपीलकर्ताओं ने वर्ष 1995 से 1997 के बीच विभिन्न आवासीय भूखंड खरीदे थे जिनका दिनांक 29 जनवरी 2003 को कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड द्वारा अधिग्रहण प्रारंभ किया गया। भूमि का कब्जा लिए जाने के बावजूद तत्काल कोई अवॉर्ड पारित नहीं किया गया और लगभग सोलह वर्षों बाद 22 अप्रैल 2019 को विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने प्रतिकर निर्धारण का अवॉर्ड जारी किया। उच्च न्यायालय के एकल पीठ द्वारा अवॉर्ड को निरस्त कर दिया गया और खंडपीठ ने रिट अपील खारिज कर दी। अपीलकर्ताओं ने मांग की कि प्रतिकर का निर्धारण 22 अप्रैल 2019 के बाजार मूल्य के आधार पर हो क्योंकि उन्हें बाईस वर्षों से न तो निर्माण का अवसर मिला और न ही प्रतिकर मिला जिससे उनके भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300 क के अंतर्गत संरक्षित संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन हुआ।
उच्चतम न्यायालय ने माना कि संपत्ति का अधिकार यद्यपि अब मौलिक अधिकार नहीं है फिर भी यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है और बिना उचित प्रतिकर के किसी को भी उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। इस मामले में देरी राज्य और उसके अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण हुई थी और अपीलकर्ताओं की कोई चूक नहीं थी। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि विशेष अधिकारी ने प्रतिकर निर्धारण केवल अवमानना याचिका पर नोटिस जारी होने के बाद वर्ष 2011 के मार्गदर्शक मूल्यों के आधार पर किया था।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धन का मूल्य समय के साथ घटता है और वर्ष 2003 की राशि से वर्ष 2025 में संपत्ति खरीदना संभव नहीं होता। इसलिए प्रतिकर का निर्धारण समयबद्ध ढंग से किया जाना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए न्यायालय ने निर्देश दिया कि विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी अपीलकर्ताओं को 22 अप्रैल 2019 के बाजार मूल्य के अनुसार प्रतिकर प्रदान करें और अपीलकर्ता भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत उपलब्ध सभी वैधानिक लाभों के भी पात्र होंगे।
इस निर्णय का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा विशेषकर उन मामलों में जहां भूमि अधिग्रहण के बाद प्रतिकर का भुगतान वर्षों तक लंबित रहता है। उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी आधार पर अधिकार क्षेत्र की आपत्ति के कारण नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और न्यायालय न्यायहित में हस्तक्षेप कर सकता है। यह फैसला न केवल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा बल्कि भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को भी बढ़ावा देगा। सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी परियोजना में भूमि अधिग्रहण के बाद शीघ्रतापूर्वक और उचित प्रतिकर प्रदान किया जाए ताकि अनावश्यक विवाद उत्पन्न न हों और नागरिकों का भरोसा राज्य पर बना रहे।