घोषित अपराधी की स्थिति में स्वतंत्र अपराध की वैधता पर उच्चतम न्यायालय का स्पष्ट निर्णय

न्यायिक निर्णय

उच्चतम न्यायालय ने Daljit Singh बनाम State of Haryana & Another, [2025] 1 S.C.R. 117 के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 174A और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 82 की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस मामले में अपीलकर्ता को अदालत द्वारा समन भेजे जाने के बावजूद अनुपस्थित रहने पर धारा 82 CrPC के तहत ‘घोषित अपराधी’ घोषित कर दिया गया था। अपीलकर्ता ने इस निर्णय और उसके विरुद्ध जारी कार्यवाहियों को रद्द करने हेतु उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

प्रश्न यह था कि क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 174A के तहत कार्यवाही जारी रह सकती है यदि धारा 82 के तहत की गई उद्घोषणा बाद में समाप्त कर दी जाए। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 174A एक स्वतंत्र और पृथक अपराध है जो उद्घोषणा के समय अदालत में अनुपस्थित रहने के अपराध पर आधारित है और उद्घोषणा की समाप्ति से इस अपराध पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि उद्घोषणा के प्रभावी रहने के दौरान व्यक्ति ने जानबूझकर अनुपस्थिति बरती है तो उसके खिलाफ धारा 174A के अंतर्गत कार्यवाही वैध है।

न्यायालय ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता को मुख्य अपराध से दोषमुक्त कर दिया गया है और अब किसी अन्य मुकदमे में उसकी उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है। चूंकि मामला वर्ष 2010 का था और विवादित धनराशि का भुगतान हो चुका था अतः न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया तथा अपीलकर्ता के विरुद्ध सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया और उसकी घोषित अपराधी की स्थिति को भी निरस्त कर दिया।

इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव में यह शामिल है कि अब धारा 174A को एक स्वतंत्र अपराध के रूप में स्थापित किया गया है जिसे मुख्य अपराध के परिणाम से पृथक माना जाएगा। आरोपी केवल इस आधार पर राहत नहीं पा सकेगा कि वह मूल अपराध से दोषमुक्त हो गया है यदि उसने न्यायालय की प्रक्रिया का उल्लंघन किया हो। न्यायालयों को अब स्पष्ट मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है कि धारा 174A को कब और कैसे लागू किया जाए तथा धारा 82 CrPC से इसकी प्रकृति कैसे भिन्न है।

साथ ही यह निर्णय उन व्यक्तियों के लिए राहत का मार्ग खोलेगा जिन्हें अनुचित तरीके से घोषित अपराधी बनाया गया है और जिनके विरुद्ध मूल आपराधिक मामले समाप्त हो चुके हैं। उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *