उच्चतम न्यायालय ने B.N. JOHN बनाम STATE OF U.P. & ANR., [2025] 1 S.C.R. 12 के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 195 और 155 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 353 और 186 का विस्तार से व्याख्या की गई है। अपीलकर्ता जो एक छात्रावास का मालिक था ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने अवैध रूप से छात्रावास पर छापा मारा और बच्चों को स्थानांतरित करने का प्रयास किया जबकि उसके विरुद्ध झूठा आरोप लगाया गया कि उसने अधिकारियों पर हमला किया। अपीलकर्ता और उसकी पत्नी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 353 के तहत एफआईआर दर्ज की गई और बाद में धारा 353 और 186 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई। अपीलकर्ता ने उक्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने के लिए न्यायालय का रुख किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धाराओं 172 से 188 के अंतर्गत अपराधों की संज्ञानता न्यायालय केवल तभी ले सकता है जब संबंधित लोक सेवक द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष विधिवत लिखित शिकायत दी गई हो न कि कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के समक्ष। इस मामले में शिकायत नगर दंडाधिकारी को दी गई थी जो न्यायिक मजिस्ट्रेट नहीं थे अतः दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 की कानूनी शर्त पूरी नहीं हुई। इसके अतिरिक्त न्यायालय ने यह भी पाया कि एफआईआर में अपराध की प्रकृति स्पष्ट नहीं थी और अपीलकर्ता द्वारा हमला करने का कोई स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया था केवल विघ्न डालने का उल्लेख था जिसे हमला नहीं माना जा सकता। बाद में दर्ज बयानों को न्यायालय ने बाद की कल्पना करार दिया और उन्हें प्राथमिकी की मूल सामग्री से असंगत पाया। न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करना उचित है। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अपराध गैर संज्ञेय हो तो धारा 155 के अनुसार पुलिस बिना सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के जांच प्रारंभ नहीं कर सकती। न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 155 और धारा 195 में उल्लिखित मजिस्ट्रेट का अर्थ केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट है न कि कार्यपालिका मजिस्ट्रेट। इस निर्णय के भविष्यगत प्रभावों में यह शामिल है कि अब पुलिस को गैर संज्ञेय मामलों में जांच शुरू करने से पहले न्यायिक मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना अनिवार्य होगा एफआईआर में अपराध की प्रकृति का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक होगा और अनुचित एफआईआर को चुनौती देना सरल होगा जिससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय एफआईआर की गुणवत्ता सुधारने और पुलिस जांच प्रक्रिया में विधिक प्रक्रिया के अनुपालन को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा।