क्या किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board – JJB) के पास ऐसी कोई विधिक शक्ति है कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अंतर्गत किसी ऐसे व्यक्ति को, जो किशोर नहीं है, अभियुक्त के रूप में समन कर सके।
प्रावधानों का विश्लेषण:
धारा 4 दंप्रसं स्पष्ट करती है कि भारतीय दंड संहिता अथवा अन्य विधियों के अंतर्गत सभी अपराधों की जांच, विचारण आदि दंप्रसं की प्रक्रिया के अनुसार होंगे, सिवाय जहाँ कोई विशेष अधिनियम अन्यथा व्यवस्था करता हो।
धारा 319 दंप्रसं न्यायालय को यह शक्ति देती है कि यदि किसी सुनवाई के दौरान ऐसा कोई अन्य व्यक्ति, जो पहले अभियुक्त नहीं था, उसके विरुद्ध प्रथमदृष्टया अपराध का संकेत मिले, तो न्यायालय उसे अभियुक्त के रूप में सम्मनित कर सकता है।
धारा 223 दंप्रसं कहती है कि एक ही लेनदेन से संबंधित समान अपराध में दो या अधिक व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से अभियोग चलाया जा सकता है।
लेकिन, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 23 यह कहती है कि किसी किशोर को किसी वयस्क व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से विचारण में नहीं रखा जा सकता।
धारा 23(2) यह भी कहती है कि यदि विचारण के दौरान यह पाया जाए कि संबंधित व्यक्ति किशोर नहीं है, तो उसका विचारण किशोर के साथ नहीं किया जाएगा।
प्रमुख निष्कर्ष:
इन सभी प्रावधानों को समन्वय में पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि—
- यदि किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष चल रही सुनवाई के दौरान ऐसा कोई प्रमाण सामने आता है जिससे यह प्रतीत होता है कि कोई वयस्क व्यक्ति भी उसी अपराध में संलिप्त है, तो JJB धारा 319 दंप्रसं के तहत उसे अभियुक्त के रूप में समन कर सकता है।
- लेकिन, उस वयस्क व्यक्ति का विचारण किशोर न्याय बोर्ड द्वारा नहीं किया जा सकता।
- JJB द्वारा समनित करने के बाद, उस वयस्क आरोपी के विरुद्ध प्रथक विचारण हेतु मामला सक्षम न्यायालय को भेजा जाएगा।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
धारा 23(2) में केवल “संयुक्त विचारण” की मनाही है, न कि वयस्क आरोपी को समन करने की। अतः यदि जेजेबी के समक्ष कोई प्रमाण आता है तो वह निष्क्रिय नहीं रह सकता और विधि द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अनुसार समन जारी कर सकता है।
निष्कर्षतः:
किशोर न्याय बोर्ड के पास यह विधिक अधिकार है कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अंतर्गत किसी वयस्क को अभियुक्त के रूप में समन कर सके, किन्तु उसके विरुद्ध विचारण JJB द्वारा न होकर सक्षम सामान्य न्यायालय में किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होता है कि विधि के उद्देश्य की पूर्ति हो सके और अपराध में संलिप्त सभी व्यक्तियों के विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाही की जा सके।