मामला और संदर्भ
Ravinder Singh बनाम राज्य सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, (2024) 2 SCC 323
उठाया गया मुख्य संवैधानिक/विधिक प्रश्न
क्या किसी अपर सत्र न्यायालय (Additional Sessions Judge) के पास यह अधिकार है कि वह दया याचिका या क्षमादान (clemency) की प्रक्रिया पर यह प्रतिबंध लगा सके कि आरोपी को कम से कम 20 वर्षों तक सजा में किसी भी प्रकार की छूट (remission) न मिले?
पृष्ठभूमि तथ्य
दिनांक 18.02.2013 को विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट, द्वारका, नई दिल्ली ने आरोपी को धारा 376, 377 और 506 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया।
दिनांक 23.02.2013 को आरोपी को निम्न सजा दी गई:
धारा 376 IPC – आजीवन कारावास व ₹25,000 जुर्माना
धारा 377 IPC – आजीवन कारावास व ₹25,000 जुर्माना
धारा 506 IPC – 2 वर्ष का कठोर कारावास व ₹10,000 जुर्माना
साथ ही न्यायालय ने आदेश दिया कि 20 वर्षों से पहले राज्य सरकार द्वारा कोई दया या क्षमादान न दी जाए।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपील में सजा को यथावत रखा। इसके विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधिक परीक्षण और निष्कर्ष
न्यायालय ने Union of India v. V. Sriharan, (2016) 7 SCC 1 एवं Swamy Shraddananda (2008) 13 SCC 767 पर भरोसा करते हुए यह स्पष्ट किया कि:
मृत्युदंड के स्थान पर विशेष प्रकार की सजा (जैसे – 20 वर्ष बिना छूट) केवल उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी जा सकती है।
सत्र न्यायालयों के पास यह अधिकार नहीं है कि वे clemency/remission को किसी निश्चित अवधि तक रोक सकें।
ऐसा आदेश अधिनियम द्वारा अनुमत क्षेत्राधिकार से परे है और विधिसम्मत नहीं।
अतः, सत्र न्यायालय द्वारा 20 वर्षों तक clemency न देने की शर्त अमान्य घोषित की गई।
प्रासंगिक विधिक प्रावधानों का सारांश (एक-पंक्तियों में)
Section 376 IPC – बलात्कार के लिए आजीवन कारावास या अन्य सजा
Section 377 IPC – अप्राकृतिक यौनाचार हेतु सजा
Section 506 IPC – आपराधिक डराने-धमकाने के लिए दंड
Article 136, Indian Constitution – विशेष अनुमति याचिका का अधिकार
Judicial Precedents:
Swamy Shraddananda v. State of Karnataka
Union of India v. V. Sriharan (2016) 7 SCC 1
न्यायसम्मत निष्कर्ष
Ravinder Singh मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सत्र न्यायालय को यह अधिकार नहीं है कि वह सजा के साथ clemency/remission प्रक्रिया को बाधित करे या 20 वर्ष की न्यूनतम अवधि तक दया याचिका पर रोक लगाए। यह अधिकार केवल संविधान द्वारा प्रदत्त सीमाओं के अंतर्गत उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को ही है। यह निर्णय न्यायिक अधिकार-क्षेत्र की मर्यादा की पुष्टि करता है और दया प्रक्रिया में विधिक अनुशासन की स्थापना करता है।