नामांकन शुल्क पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

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नामांकन शुल्क पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती – अधिवक्ताओं के प्रवेश को आर्थिक रूप से सुलभ बनाने का मार्ग प्रशस्त

सुप्रीम कोर्ट ने गौरव कुमार द्वारा दायर याचिका में एक महत्वपूर्ण निर्णय पारित करते हुए कहा कि वकीलों के नामांकन के लिए राज्य बार परिषदें अधिनियम में निर्धारित शुल्क से अधिक राशि नहीं वसूल सकतीं। यह निर्णय अधिवक्ताओं अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के आलोक में लिया गया, जिसमें स्पष्ट रूप से नामांकन शुल्क की सीमा निर्धारित की गई है। 

गौरव कुमार ने याचिका के माध्यम से यह चुनौती दी थी कि राज्य बार परिषदें नामांकन के समय ₹750 (सामान्य वर्ग) और ₹125 (अनुसूचित जाति/जनजाति) की वैधानिक सीमा से कहीं अधिक शुल्क वसूल रही हैं। इसमें लाइब्रेरी शुल्क, प्रशिक्षण शुल्क, प्रोसेसिंग शुल्क, और विविध मदों में ₹15000 से ₹42000 तक की राशि शामिल थी। 

याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि ऐसा प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत पेशा अपनाने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों को कानून के पेशे में प्रवेश से रोकती है। 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 एक समग्र विधिक कोड है और बार परिषदें अधिनियम की धारा 24(1)(f) के तहत ही शुल्क वसूल सकती हैं। अधिनियम की धारा 49 में नियम बनाने का अधिकार है, परंतु यह अधिकार अधिनियम की मूल भावना के विपरीत नहीं हो सकता। 

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि बार परिषदों द्वारा अतिरिक्त शुल्क लेना मनमाना है और यह अनुचित भेदभाव पैदा करता है। नामांकन शुल्क के अतिरिक्त अन्य कोई राशि तभी ली जा सकती है जब वह सेवा-आधारित हो और नामांकन के बाद ही लगाई जाए। 

संविधान के अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि सभी नागरिकों को समान अवसर मिलना चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को वकालत से वंचित करने वाली प्रणाली असंवैधानिक मानी जाएगी। अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत नागरिकों को अपनी पसंद का पेशा चुनने की स्वतंत्रता है, और इस पर सीमाएं केवल सार्वजनिक हित में ही लगाई जा सकती हैं। 

अदालत ने माना कि अधिवक्ताओं की नामांकन प्रक्रिया में कोई भी अतिरिक्त वित्तीय बाधा पैदा करना संविधान और विधि के विरुद्ध है। बार परिषदों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वे अधिनियम में निर्धारित शुल्क के अतिरिक्त कोई भी राशि नामांकन की शर्त के रूप में न वसूलें। 

इस फैसले से हजारों कानून स्नातकों को राहत मिली है जो आर्थिक कठिनाइयों के कारण वकील के रूप में पंजीकरण नहीं कर पा रहे थे। यह निर्णय विधि के पेशे को अधिक समावेशी और समानतामूलक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सामाजिक न्याय, समान अवसर और संवैधानिक मर्यादाओं की पुनः पुष्टि करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि कानून का पेशा केवल सक्षम वर्ग तक सीमित न रह जाए। 

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