अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय: वैश्विक न्याय व्यवस्था का स्तंभ

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परिचय
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice – ICJ) विश्व समुदाय की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है, जिसकी स्थापना का उद्देश्य राष्ट्रों के मध्य उत्पन्न होने वाले कानूनी विवादों का निपटारा करना और संयुक्त राष्ट्र के अंगों को कानूनी विषयों पर परामर्श देना है। इसका मुख्यालय नीदरलैंड्स के हेग शहर में स्थित है। न्यायालय संयुक्त राष्ट्र के अंगों में से एक है और इसकी भूमिका न केवल निर्णय देने तक सीमित है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय विधिक सिद्धांतों को स्पष्ट करने और विकसित करने का कार्य भी करता है।

भूमिका का दोहरा स्वरूप
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की भूमिका दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित है:

  1. विवादात्मक मामले (Contentious Cases):
    जब दो राज्यों के बीच कानूनी विवाद उत्पन्न होता है, और एक पक्ष उस विवाद को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करता है, तो न्यायालय उस मामले की सुनवाई करता है और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार निर्णय सुनाता है। यह प्रक्रिया तभी प्रारंभ हो सकती है जब दोनों पक्ष न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को मान्यता दें।
  2. परामर्शात्मक कार्यवाही (Advisory Proceedings):
    न्यायालय उन मामलों में भी सक्रिय भूमिका निभाता है जहाँ संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अंग या उससे संबद्ध विशिष्ट एजेंसियाँ किसी कानूनी प्रश्न पर न्यायालय की राय मांगते हैं। इस प्रकार की राय बाध्यकारी नहीं होती, किंतु उसका विधिक और नैतिक प्रभाव अत्यधिक होता है।

मामलों की प्रस्तुति और नामकरण की प्रक्रिया
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में प्रस्तुत विवादों के शीर्षकों की रचना एक विशेष नियम के तहत की जाती है। यदि मामला किसी एक राज्य द्वारा एकतरफा रूप से प्रस्तुत किया जाता है, तो दोनों पक्षों के नामों के बीच v. (जो लैटिन शब्द versus का संक्षिप्त रूप है) का प्रयोग किया जाता है। जैसे—Cameroon v. Nigeria

वहीं यदि मामला विशेष समझौते (Special Agreement) के तहत दोनों राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है, तो दोनों नामों के बीच तिरछी रेखा ( / ) का प्रयोग किया जाता है। जैसे—Indonesia/Malaysia

इतिहास और आंकड़े
न्यायालय की कार्यसूची का आरंभ 22 मई 1947 को हुआ, जब Corfu Channel (United Kingdom v. Albania) नामक पहला मामला इसके समक्ष प्रस्तुत किया गया। यह मामला विश्व युद्ध के पश्चात् का था, जिसमें ब्रिटिश नौसेना के जहाज़ों के अल्बानियाई जलक्षेत्र में हुए विस्फोटों पर विवाद था।

इसके बाद से लेकर 23 दिसंबर 2024 तक, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की जनरल लिस्ट में कुल 196 मामले दर्ज किए गए। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रों ने आपसी विवादों के समाधान के लिए इस न्यायिक मंच पर भरोसा जताया है।

निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय एक ऐसा मंच है जो देशों को हथियारों की बजाय कानून के माध्यम से विवाद सुलझाने की राह प्रदान करता है। इसकी कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और निष्पक्षता इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बनाती है। जैसे-जैसे अंतर्राष्ट्रीय संबंध जटिल होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे इस न्यायालय की प्रासंगिकता और आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है।

एक ऐसी दुनिया की कल्पना, जहाँ विवादों का समाधान न्याय और विधि के आधार पर हो, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की उपलब्धियों के बिना अधूरी है

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