भारत का प्रथम उच्च न्यायालय: कोलकाता उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक गौरव और क्षेत्राधिकार

न्यायिक प्रक्रिया

कोलकाता उच्च न्यायालय भारत का सबसे पुराना उच्च न्यायालय है। यह पश्चिम बंगाल राज्य और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह केंद्र शासित प्रदेश पर क्षेत्राधिकार रखता है। इस न्यायालय की इमारत का डिज़ाइन बेल्जियम के यपरेस (Ypres) शहर में स्थित ‘क्लॉथ हॉल’ (Cloth Hall) पर आधारित है, जिसे सरकारी वास्तुविद श्री वॉल्टर ग्रानविल द्वारा तैयार किया गया था।

यह उच्च न्यायालय 1 जुलाई 1862 को उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के तहत स्थापित किया गया था। इसे फोर्ट विलियम स्थित न्यायालय (High Court of Judicature at Fort William) के रूप में जाना जाता था और इसके गठन का आधार 14 मई, 1862 को जारी लेटर्स पैटेंट (Letters Patent) था, जिसमें इसकी शक्तियों और अधिकार क्षेत्र की परिभाषा की गई थी।

कोलकाता उच्च न्यायालय का मुख्यालय पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित है। इसके अतिरिक्त, इसकी स्थायी सर्किट पीठें पोर्ट ब्लेयर (अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी) और जलपाईगुड़ी (पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी मंडल का मुख्यालय) में भी कार्यरत हैं।

इस न्यायालय में 72 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या निर्धारित है।

इस उच्च न्यायालय के पहले मुख्य न्यायाधीश सर बार्न्स पीकॉक थे, और इसे आधिकारिक रूप से 1 जुलाई, 1862 को प्रारंभ किया गया था। 2 फरवरी, 1863 को न्यायमूर्ति शम्भूनाथ पंडित पहले भारतीय न्यायाधीश बने। इसके बाद अनेक प्रसिद्ध भारतीय न्यायविदों ने न्यायाधीश के रूप में अपनी सेवाएं दीं, जिनमें न्यायमूर्ति द्वारकानाथ मित्तिर, न्यायमूर्ति रमेश चंद्र मित्तिर, सर चंद्र माधव घोष, सर गुरुदास बनर्जी, सर आशुतोष मुखर्जी, और न्यायमूर्ति पी.बी. चक्रवर्ती प्रमुख हैं। न्यायमूर्ति पी.बी. चक्रवर्ती कोलकाता उच्च न्यायालय के पहले स्थायी भारतीय मुख्य न्यायाधीश बने।

कोलकाता उच्च न्यायालय को भारत का पहला उच्च न्यायालय होने का गौरव प्राप्त है, और यह भारत के तीन चार्टर्ड उच्च न्यायालयों (कोलकाता, मुंबई और मद्रास) में से एक है, जिन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित किया गया था।

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