नेपाल में बाल विवाह पर फिर संकट

अंतर्राष्ट्रीय कानून

नेपाल में बाल विवाह पर फिर संकट: विवाह की न्यूनतम उम्र घटाने के प्रस्ताव से लड़कियों का भविष्य अधर में

काठमांडू/बर्दिया (नेपाल) – नेपाल में विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र को 20 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने का प्रस्ताव एक बार फिर बाल विवाह को सामाजिक रूप से वैध बनाने की ओर संकेत कर रहा है। यह प्रस्ताव न केवल महिला अधिकार संगठनों में चिंता का विषय बना हुआ है, बल्कि यह देश की वर्षों की सामाजिक प्रगति को भी पीछे ले जाने वाला कदम माना जा रहा है।

नेपाल में 2017 में लागू किए गए कानून के तहत विवाह की न्यूनतम उम्र 20 वर्ष निर्धारित की गई थी, जिसका उद्देश्य किशोरियों को शिक्षा पूरी करने और जीवन के निर्णय स्वयं लेने के लिए पर्याप्त समय देना था। इसके तहत, कानून का उल्लंघन करने पर तीन वर्ष तक की सजा और दंड का प्रावधान भी किया गया था।

नए प्रस्ताव की पृष्ठभूमि

15 जनवरी 2025 को नेपाल की संसद की एक उपसमिति द्वारा यह सिफारिश की गई कि विवाह की न्यूनतम उम्र को फिर से 18 वर्ष किया जाए। प्रस्ताव में तर्क दिया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए यह परिवर्तन “कानूनी जटिलताओं को कम करेगा और सामाजिक व्यवहार के अनुरूप होगा”।

हालाँकि, महिला अधिकार संगठनों, मानवाधिकार समूहों, और शिक्षा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने इस सिफारिश को बाल अधिकारों के विरुद्ध और लैंगिक असमानता को बढ़ावा देने वाला बताया है। उनका कहना है कि यह प्रस्ताव असल में लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय पुरुषों को कानून से बचाने के इरादे से लाया गया है।

बाल विवाह की स्थिति

नेपाल में बाल विवाह 1963 से अवैध है, फिर भी यह ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक रूप से प्रचलित है। देश की लगभग 78% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, जहाँ बाल विवाह सामाजिक परंपरा और आर्थिक तंगी के कारण आज भी जारी है।

यूनिसेफ (UNICEF) के अनुसार, नेपाल में 5 मिलियन से अधिक बाल वधुएँ हैं, और 30 वर्ष से कम आयु की 37% महिलाएँ 18 वर्ष की उम्र से पहले ही विवाह कर चुकी हैं। यह स्थिति न केवल लड़कियों के शिक्षा व करियर को बाधित करती है, बल्कि उन्हें शारीरिक, मानसिक और सामाजिक शोषण के ख़तरों में भी डाल देती है।

विवाह की उम्र घटाने के संभावित प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि विवाह की न्यूनतम उम्र घटाने से:

  • बाल विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिल सकती है,
  • किशोरियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता बाधित हो सकती है,
  • स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएँ, जैसे कुपोषण, रक्ताल्पता, और मातृ-शिशु मृत्यु दर में वृद्धि हो सकती है,
  • और यह सभी प्रभाव विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े वर्गों की लड़कियों को प्रभावित करेंगे।

संगठनों का यह भी कहना है कि बाल विवाह के कारण किशोरियाँ अक्सर सामाजिक अलगाव, आर्थिक निर्भरता, और घरेलू हिंसा का शिकार बनती हैं, जिससे उनके लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ना लगभग असंभव हो जाता है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और नेपाल की प्रगति

हाल के वर्षों में नेपाल में बाल विवाह की दर में कुछ कमी आई है, लेकिन यह दक्षिण एशियाई औसत की तुलना में काफी धीमी है। चाइल्ड मैरिज डेटा पोर्टल के अनुसार, जहाँ दक्षिण एशिया में बाल विवाह की दर में 15% की कमी आई है, वहीं नेपाल में यह कमी सिर्फ 7% रही है।

नेपाल सरकार ने 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसके लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से जागरूकता और कानून प्रवर्तन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

यदि विवाह की न्यूनतम उम्र घटाई जाती है, तो यह न केवल इन प्रयासों को कमजोर करेगा, बल्कि संविधान में निहित लैंगिक समानता और शिक्षा के अधिकारों का भी उल्लंघन माना जाएगा।

संघर्ष और समाधान की राह

नेपाल के कुछ जिलों में स्थानीय संगठनों द्वारा पुलिस, विद्यालयों, धार्मिक नेताओं और युवाओं को प्रशिक्षण देकर बाल विवाह की रोकथाम की दिशा में ठोस कार्य किया गया है, जिससे कुछ क्षेत्रों में बाल विवाह की दर में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई है।

सामाजिक संगठनों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में बाल विवाह समाप्त करना चाहती है, तो उसे:

  • विवाह की वर्तमान कानूनी उम्र को बनाए रखना चाहिए,
  • ग्रामीण समुदायों में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास तेज़ करने चाहिए,
  • और उन परिवारों को आर्थिक व सामाजिक सहयोग देना चाहिए जो अपनी बेटियों की शिक्षा जारी रखना चाहते हैं।

नेपाल में विवाह की न्यूनतम उम्र को 20 वर्ष निर्धारित करना एक सुधारात्मक और प्रगतिशील निर्णय था, जिसने किशोरियों के लिए शिक्षा, स्वतंत्रता और सुरक्षित भविष्य के दरवाज़े खोले। अब इस उम्र को घटाने की सिफारिश, उस पूरी सोच को पलट देने का प्रयास है, जिसमें लड़कियों को निर्णय लेने का अवसर दिया गया था।

ऐसे समय में, जब देश बाल विवाह उन्मूलन की दिशा में राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर प्रतिबद्धता व्यक्त कर चुका है, यह प्रस्ताव एक विपरीत दिशा में उठाया गया कदम प्रतीत होता है। यह न केवल लड़कियों के अधिकारों का हनन करेगा, बल्कि नेपाल की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुँचा सकता है।

सरकार, समाज और नीति निर्माताओं के लिए यह समय है कि वे इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कानून के वर्तमान स्वरूप को बनाए रखें, और यह सुनिश्चित करें कि हर लड़की को समान अवसर, शिक्षा, और स्वतंत्र निर्णय का अधिकार मिले।

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