नेपाल में हाल के दिनों में जिस प्रकार से हिंदू राष्ट्र की पुनः स्थापना और राजशाही की वापसी को लेकर आंदोलन तेज हुए हैं, वह केवल आंतरिक राजनीतिक असंतोष का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी एक संभावित चुनौती बन सकते हैं। राजशाही समर्थक प्रदर्शनकारी, पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह के समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं और यह मांग कर रहे हैं कि नेपाल को फिर से “हिंदू राष्ट्र” घोषित किया जाए।
यह आंदोलन केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान लोकतांत्रिक सरकार के प्रति असंतोष, राजनीतिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अस्थिर शासन का परिणाम भी है। पिछले 17 वर्षों में नेपाल में 13 सरकारें बदली हैं, और इस बार-बार की सत्ता-परिवर्तन की प्रक्रिया ने जनता के बीच लोकतंत्र की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि जब-जब लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं असफल हुईं, तो राजशाही या तानाशाही जैसे विकल्पों को लोगों ने सहजता से अपनाया। जिससे न केवल आंतरिक दमन बढ़ा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उथल-पुथल पैदा हुई।
वर्तमान स्थिति में, यदि नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को फिर से राजशाही से प्रतिस्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाए जाते हैं, तो यह न केवल आंतरिक संघर्ष को जन्म देगा बल्कि भारत, चीन और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की रणनीतिक स्थिरता पर भी प्रभाव डाल सकता है। नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान पर रखती है, और किसी भी प्रकार की अस्थिरता पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है।

हालाँकि, इस असंतोष के मूल में नेपाल की घरेलू राजनीतिक दलों में फैला भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग और जवाबदेही की कमी है। यदि यही राजनीतिक शून्यता बनी रही, तो लोगों का विश्वास लोकतंत्र से उठेगा और वे वैकल्पिक व्यवस्थाओं की ओर आकर्षित होंगे।
नेपाल में हिंदू राष्ट्र और राजशाही की मांग एक राजनीतिक चेतावनी है। इसे नज़रअंदाज़ करना केवल आंदोलनकारियों की ताक़त को बढ़ाना होगा। इसके बजाय, लोकतांत्रिक दलों को आत्ममंथन कर, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और शासन व्यवस्था में पारदर्शिता लाकर जनता का विश्वास पुनः अर्जित करना चाहिए। तभी नेपाल न केवल आंतरिक रूप से स्थिर रहेगा, बल्कि दक्षिण एशिया की शांति और संतुलन में भी अपना सक्रिय योगदान दे सकेगा।