भारत सरकार ने अंगदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों को अंगदान करने पर विशेष आकस्मिक अवकाश प्रदान किया जाएगा। यह निर्णय न केवल अंगदाता की शारीरिक रिकवरी के लिए समय सुनिश्चित करता है, बल्कि समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता को भी बढ़ावा देता है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 2 अप्रैल को लोकसभा में इस पहल की जानकारी दी, जिसके अनुसार अंगदान करने वाले कर्मचारियों को अधिकतम 42 दिन का विशेष आकस्मिक अवकाश दिया जा सकता है, बशर्ते सरकारी चिकित्सक की सिफारिश प्राप्त हो।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि अंग निकालने की प्रक्रिया एक जटिल शल्यक्रिया होती है, जिसके बाद रिकवरी के लिए पर्याप्त आराम की आवश्यकता होती है। इसलिए केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है। इन छुट्टियों के साथ किसी अन्य अवकाश को जोड़ने की अनुमति नहीं होगी, हालांकि यदि सर्जरी के दौरान कोई चिकित्सकीय जटिलता उत्पन्न होती है तो डॉक्टर की सिफारिश पर नियमों में लचीलापन बरता जा सकता है।
भारत में अंगदान की स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के अनुसार, 2023 में देश में लगभग 18,000 अंग प्रत्यारोपण हुए, जो 2013 की तुलना में कहीं अधिक है, जब यह संख्या मात्र 5,000 के आसपास थी। इन प्रत्यारोपणों में जीवित दाताओं की संख्या लगभग 15,000 रही, जिनमें महिलाएं पुरुषों से अधिक थीं। मृतकों से प्राप्त अंगों की संख्या करीब 1,100 रही। 2023 में लगभग 220 हृदय, 4,500 लिवर और 13,000 से अधिक किडनी प्रत्यारोपित किए गए।
हालांकि यह प्रगति दर्शाती है कि देश में अंगदान के प्रति रुचि बढ़ रही है, फिर भी यह संख्या भारत की जरूरतों की तुलना में अत्यंत कम है। ऑर्गन इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग 5 लाख लोगों को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें से केवल 2 से 3 प्रतिशत मांग ही पूरी हो पाती है। अमेरिका और स्पेन जैसे देशों में अंगदान की दर क्रमशः प्रति दस लाख जनसंख्या पर 32 और 47 है, जबकि भारत में यह आंकड़ा महज 1 है।
अंगदान दो प्रकार का होता है—पहला, जीवित व्यक्ति द्वारा और दूसरा, मृत व्यक्ति द्वारा। जीवित दाता आमतौर पर किडनी या लिवर का एक हिस्सा दान करता है। दूसरी ओर, मृत व्यक्ति से अंगदान तभी संभव होता है जब उसे ब्रेन डेड घोषित किया गया हो। भारत में हर वर्ष करीब डेढ़ लाख लोग दुर्घटनाओं में ब्रेन डेड हो जाते हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम मामलों में अंगदान हो पाता है।
कोई भी नागरिक NOTTO की वेबसाइट पर जाकर अंगदान फॉर्म भर सकता है और डोनर कार्ड प्राप्त कर सकता है। यह कार्ड हमेशा साथ रखना चाहिए और अपने परिजनों को इस निर्णय की जानकारी देनी चाहिए ताकि समय आने पर अंगदान की प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।
हालांकि यह सरकारी पहल सराहनीय है, परंतु इससे जुड़ी कुछ चिंताएं भी हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत में अब भी अंगदान को लेकर सामाजिक मिथक और जागरूकता की कमी है। कई लोग इसे धार्मिक या भावनात्मक दृष्टि से स्वीकार नहीं करते। इसके अलावा, ब्रेन डेड की पुष्टि और अंग निकालने की प्रक्रिया को लेकर भी पर्याप्त चिकित्सकीय सुविधाएं और प्रशिक्षित स्टाफ की उपलब्धता नहीं है।
केंद्र सरकार द्वारा छुट्टियों के माध्यम से अंगदान को प्रोत्साहित करने की पहल निश्चित रूप से एक सकारात्मक दिशा में कदम है, लेकिन इसे प्रभावशाली बनाने के लिए व्यापक जनजागरण, शिक्षण अभियानों, और चिकित्सा प्रणाली के सुदृढ़ीकरण की भी आवश्यकता है, ताकि हर जरूरतमंद को समय पर जीवन रक्षक अंग मिल सके और देश में अंगदान को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त हो सके।
हालांकि, इस संवेदनशील विषय पर सरकारी प्रोत्साहन के साथ-साथ कुछ गहन चिंताएं भी सामने आती हैं, जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है। प्रमुख चिंता यह है कि इस प्रकार की योजनाओं का कोई संगठित अपराध गिरोह या अवैध मानव अंग तस्करी से जुड़ा नेटवर्क दुरुपयोग न कर सके। यह संभावना भी बनी रहती है कि कमजोर आर्थिक वर्ग के कर्मचारी या उनके परिजन किसी दबाव में आकर अंगदान के लिए विवश हो जाएं, जो नीतिगत रूप से और मानवाधिकारों के लिहाज़ से चिंताजनक है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अंगदान की पूरी प्रक्रिया स्वैच्छिक, पारदर्शी और नैतिक मानकों के अनुरूप हो। इसके लिए अस्पतालों और प्रशासनिक इकाइयों में मजबूत सत्यापन प्रणाली और निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना आवश्यक है, ताकि अंगदान किसी भी प्रकार के बलपूर्वक प्रयास या आर्थिक प्रलोभन के तहत न किया जाए।
इसके अतिरिक्त, यह भी देखा गया है कि अंगदान से जुड़े ब्रेन डेड मामलों की पहचान, प्रमाणन और निगरानी की प्रक्रिया कई बार अस्पष्ट और विवादास्पद रही है। इस दिशा में एक वैज्ञानिक, नैतिक और कानूनी रूप से मजबूत प्रणाली बनाए जाने की आवश्यकता है, जिससे मृतक के अंगों का दान केवल उचित प्रक्रिया के तहत ही किया जाए।

एक और बड़ी चिंता यह है कि अंगदान को बढ़ावा देने की सरकारी पहल कहीं केवल औपचारिक घोषणाओं तक सीमित न रह जाए, बल्कि जमीनी स्तर पर इस नीति का क्रियान्वयन प्रभावी रूप से किया जाए। इसके लिए न केवल स्वास्थ्य कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना जरूरी है, बल्कि आम जनता के बीच जागरूकता अभियान भी चलाना होगा, जिससे अंगदान को लेकर व्याप्त मिथकों और सामाजिक हिचकिचाहट को दूर किया जा सके।
इस पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा अवकाश की सुविधा देना एक स्वागत योग्य कदम है, परंतु इसके साथ कड़े नियमों, पारदर्शिता और निगरानी तंत्र की स्थापना उतनी ही आवश्यक है। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अंगदान के नाम पर कोई भी व्यक्ति शोषण का शिकार न हो और यह प्रक्रिया संपूर्ण रूप से मानव गरिमा, स्वतंत्रता और कानून के अनुसार संचालित हो।