सुप्रीम कोर्ट में मामलों के तेजी से निपटान के उद्देश्य से चल रहे पेंडेंसी प्रोजेक्ट को फरवरी 2025 में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। Centre for Research and Planning (CRP) द्वारा किए गए विश्लेषण के तहत, कोर्ट के चार नियमित कार्यदिवसों में 128 पुराने, संक्षिप्त या निष्प्रभावी आपराधिक और दीवानी मामलों की पहचान की गई, जिन्हें या तो निपटा दिया गया या निर्णय हेतु सुरक्षित रख लिया गया। इसी अवधि में CRP ने 288 ऐसे ही प्रकृति के विविध (Miscellaneous) मामलों की पहचान की, जिन्हें न्यायालय द्वारा सुलझा लिया गया।
इस परियोजना से जुड़े न्यायिक लॉ क्लर्क्स को प्रशिक्षित करने और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से, 8 फरवरी 2025 को ‘सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में रजिस्ट्रार कोर्ट और जनहित याचिका समिति (PIL Committee) की भूमिका’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इस सत्र को रजिस्ट्रार (न्यायिक II) सुजाता सिंह ने संबोधित किया, जिन्होंने उत्तराखंड न्यायिक सेवा में अपने 22 वर्षों के अनुभव के आधार पर छात्रों को न्यायिक प्रबंधन की बारीकियों से अवगत कराया।
सुजाता सिंह ने रजिस्ट्रार कोर्ट, PIL समिति और Gender Sensitisation and Internal Complaints Committee (GSICC) के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड रूम न्यायिक प्रणाली में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में रजिस्ट्रार कोर्ट में 3,859 मामले लंबित हैं, और इन मामलों के शीघ्र निपटान हेतु लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
व्याख्यान के दौरान सुश्री सिंह ने PIL समिति की भूमिका को विस्तार से समझाया, जिसमें प्राप्त होने वाली बड़ी संख्या में याचिकाओं की सतर्क और सूक्ष्म समीक्षा की जाती है। उन्होंने जिला न्यायालयों में विशेष रूप से आपराधिक मामलों में होने वाली देरी पर भी ध्यान आकर्षित किया और इसे अनुवाद की बाधाओं, गवाहों की उपलब्धता की समस्या और वकीलों की हड़ताल जैसी प्रक्रियात्मक जटिलताओं से जोड़ कर देखा।
उन्होंने सभी लॉ क्लर्क्स से आग्रह किया कि वे न्यायिक सेवा को एक मिशन के रूप में लें और ईमानदारी, निष्ठा और सेवा भावना से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें।
सुधार और चुनौतियाँ: एक संतुलन जरूरी

जहां यह परियोजना एक प्रशंसनीय पहल के रूप में सामने आई है, वहीं यह भी आवश्यक है कि निपटाए गए मामलों की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर कोई समझौता न हो। तेज़ न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर सतही स्तर पर मामलों का片तरफा निपटान न्याय के सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है।
पेंडेंसी की समस्या का स्थायी समाधान केवल उच्चतम न्यायालय के प्रयासों से नहीं होगा, बल्कि इसकी जड़ें निचली अदालतों की संरचना, प्रक्रियाओं और संसाधनों में छिपी हैं। अतः आवश्यक है कि इसी तरह की कार्यशालाएं और दक्षता बढ़ाने की गतिविधियां जिला एवं सत्र न्यायालय स्तर पर भी नियमित रूप से आयोजित की जाएं।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट की यह पहल केवल तात्कालिक निपटान न होकर दीर्घकालिक सुधार और न्यायिक कुशलता की ओर एक ठोस कदम के रूप में देखी जा सकती है।