प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक बलात्कार के मामले में आरोपी को जमानत देते हुए ऐसा बयान दिया है, जो सार्वजनिक और कानूनी हलकों में बहस का विषय बन गया है। अपने आदेश में न्यायालय ने कहा कि पीड़िता, जो एक शिक्षित युवती है, ने अपने व्यवहार और निर्णयों से स्वयं को जोखिम में डाला।
घटना का विवरण इस प्रकार है कि एक युवती, जो स्नातकोत्तर की छात्रा है, दिल्ली के हौज खास स्थित एक बार में अपनी महिला मित्रों के साथ गई थी। वहां कुछ पुरुषों से, जिनमें आरोपी भी शामिल था, उसकी मुलाकात हुई। पीड़िता के अनुसार, नशे की हालत में आरोपी उसे गुड़गांव ले गया, जहां कथित रूप से दो बार उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इसके बाद गौतम बुद्ध नगर में एफआईआर दर्ज कराई गई और आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
जमानत देते हुए न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़िता ने अपनी उम्र, शिक्षा और समझ के बावजूद ऐसे हालात बनाए जिनसे वह स्वयं संकट में फंसी। अदालत ने कहा कि वह अपने फैसलों के नतीजों को समझने में सक्षम थी, और उसकी ओर से किसी दबाव का सीधा आरोप नहीं था कि वह पूरी तरह असहाय थी।
मेडिकल जांच में हाइमन के फटे होने की पुष्टि हुई, परन्तु डॉक्टर ने यौन उत्पीड़न की संभावना को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया। आरोपी के आपराधिक रिकॉर्ड न होने, उसकी जेल में बिताई गई अवधि और आगे की जांच में सहयोग की संभावना को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने उसे जमानत देने का निर्णय लिया।

इस निर्णय में प्रयुक्त भाषा को लेकर व्यापक आलोचना हो रही है। कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ पीड़िताओं के लिए न्याय की राह कठिन बना सकती हैं। उनका तर्क है कि ऐसे मामलों में पीड़िता के चरित्र पर आधारित कोई भी सार्वजनिक टिप्पणी न्यायिक मर्यादा के विपरीत होती है।
यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि यौन अपराधों में संवेदनशीलता और न्यायिक विवेक दोनों का संतुलन आवश्यक है। उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी निश्चित रूप से कानून, समाज और पीड़ित अधिकारों के दृष्टिकोण से बहस का विषय बनी रहेगी।