1919 के जलियांवाला बाग़ नरसंहार के बाद, जब ब्रिटिश साम्राज्य ने अपने अत्याचारों को छिपाने की कोशिश की, तब एक भारतीय न्यायविद् और राष्ट्रवादी ने उन्हें उनके ही न्यायालय में चुनौती दी। यह साहसी व्यक्ति थे शंकरन नायर, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के उच्चतम पदों में से एक—वायसराय की कार्यकारी परिषद—से इस्तीफा देकर विरोध दर्ज कराया और फिर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी।
जलियांवाला बाग़ के विरोध में इस्तीफा: 1919 में अमृतसर में हुए जलियांवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में, शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारी परिषद से इस्तीफा दे दिया, जो उस समय किसी भारतीय के लिए उच्चतम प्रशासनिक पद था। 1922 में, उन्होंने अपनी पुस्तक Gandhi and Anarchy में पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर पर नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराया। ओ’ड्वायर ने उन्हें मानहानि के लिए इंग्लैंड में अदालत में घसीटा।यह मुकदमा लंदन के किंग्स बेंच में पांच सप्ताह तक चला, जो उस समय का सबसे लंबा नागरिक मुकदमा था। हालांकि नायर को दोषी ठहराया गया और £500 का जुर्माना लगाया गया, लेकिन उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया और जुर्माना भर दिया।केरल में जन्मे नायर ने पंजाब में हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई, जिससे उन्होंने राष्ट्रीय एकता और मानवता के लिए खड़े होने का उदाहरण प्रस्तुत किया।

उनकी इस वीरगाथा को अब फिल्म ‘केसरी चैप्टर 2’ में अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा चित्रित किया गया है, जो 18 अप्रैल 2025 को रिलीज़ हुई है।शंकरन नायर की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल मैदानों में नहीं, बल्कि अदालतों में भी लड़ा गया था। उनकी निर्भीकता और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता आज भी प्रेरणा का स्रोत है।