क्या सरकारी पद के दुरुपयोग के आरोपों से संबंधित मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले प्राथमिक जांच (preliminary inquiry) अनिवार्य है।

विधिक समाचार

PRADEEP NIRANKARNATH SHARMA बनाम STATE OF GUJARAT & ORS.
SCR उद्धरण: [2025] 4 S.C.R. 32
तारीख: 17 मार्च 2025
न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति विक्रम नाथ
प्रकरण प्रकार: आपराधिक अपील /1313/2025
निर्णय: अपील खारिज
न्यूट्रल सिटेशन: 2025 INSC 350

मुख्य बिंदु (हेडनोट) —

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 154 –
अपीलकर्ता ने Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh & Ors. पर भरोसा रखते हुए यह तर्क दिया कि सरकारी पद के दुरुपयोग के आरोपों से संबंधित मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले प्राथमिक जांच (preliminary inquiry) अनिवार्य है।

सत्यता: निर्णय –
 Lalita Kumari मामले में स्पष्ट किया गया कि प्राथमिक जांच केवल उन्हीं परिस्थितियों में की जानी चाहिए जहाँ प्राप्त सूचना प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का प्रकटीकरण नहीं करती है और पुष्टि की आवश्यकता होती है। परंतु जहाँ सूचना स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराध को प्रदर्शित करती है, वहाँ एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस के पास प्राथमिक जांच करने का कोई विवेकाधिकार नहीं होता।

Lalita Kumari का निर्णय यह अनिवार्य नियम स्थापित नहीं करता कि हर मामले में एफआईआर दर्ज करने से पूर्व प्राथमिक जांच होनी ही चाहिए; बल्कि यह सिद्धांत दोहराता है कि जब सूचना प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध को दर्शाती है, तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना बाध्यकारी होता है।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 154 –
उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें यह निर्देश देने हेतु मैंडेमस जारी करने की माँग की गई थी कि उसके विरुद्ध किसी भी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से पहले उत्तरदायी अधिकारी प्राथमिक जांच करें।

सत्यता: निर्णय –
वर्तमान मामले में अपीलकर्ता पर लगे आरोप उनके आधिकारिक पद पर रहते हुए पद का दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण से संबंधित हैं, जो स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराधों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले प्राथमिक जांच की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है।

अपीलकर्ता का यह तर्क कि उसके विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से अनेक एफआईआर दर्ज की गई हैं, जाँच और न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान परीक्षण का विषय है। अपीलकर्ता को कानून के अंतर्गत पर्याप्त उपाय उपलब्ध हैं, जैसे कि धारा 482 CrPC के तहत निराधार एफआईआर को रद्द करवाने का अधिकार, जमानत हेतु आवेदन करने का अधिकार तथा अन्वेषण प्राधिकरणों की किसी भी गैरकानूनी कार्रवाई को उपयुक्त मंच पर चुनौती देने का अधिकार।
[अनुच्छेद 13]

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – एफआईआर – वैधानिक ढाँचा – न्यायिक अतिक्रमण –
क्या यह न्यायालय ऐसा सर्वसमावेशी निर्देश जारी कर सकता है जिससे अपीलकर्ता के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने पर रोक लगाई जा सके अथवा भविष्य में सभी मामलों में प्राथमिक जांच अनिवार्य की जा सके?

निर्णय –
यह न्यायालय ऐसा कोई व्यापक निर्देश जारी नहीं कर सकता जिससे अपीलकर्ता के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने से रोका जा सके या भविष्य के सभी मामलों में प्राथमिक जांच को अनिवार्य बनाया जा सके। ऐसा निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता की वैधानिक रूपरेखा के विपरीत होगा और न्यायिक अतिक्रमण की श्रेणी में आएगा।

जैसा कि उच्च न्यायालय ने ठीक ही अवलोकन किया है, न्यायालय वैधानिक प्रावधानों को न तो पुनर्लेखित कर सकते हैं और न ही ऐसे अतिरिक्त प्रक्रियात्मक संरक्षण लागू कर सकते हैं जिन्हें विधि द्वारा परिकल्पित नहीं किया गया है।

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