बॉम्बे हाईकोर्ट का इतिहास और विकास

न्यायिक प्रक्रिया

बॉम्बे हाईकोर्ट की स्थापना 14 अगस्त 1862 को की गई थी। इस उच्च न्यायालय को मूल (Original) और अपील (Appellate) दोनों प्रकार की अधिकारिता प्राप्त थी। मूल अधिकारिता सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त हुई थी, जबकि अपीलीय अधिकारिता “सदर दीवानी” और “सदर फौजदारी अदालतों” से आई थी, जिन्हें उच्च न्यायालय में विलीन कर दिया गया था। उच्च न्यायालय की स्थापना के साथ ही दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता तथा दीवानी प्रक्रिया संहिता अधिनियमित किए गए।

बॉम्बे हाईकोर्ट के चार्टर में 15 न्यायाधीशों की स्वीकृति दी गई थी, परंतु प्रारंभ में केवल 7 न्यायाधीशों के साथ कार्य शुरू हुआ। लगभग 60 वर्षों तक केवल 7 न्यायाधीशों ने ही काम संभाला, जबकि समय के साथ कानूनों और मुकदमों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। 1919 तक यह सीमित संख्या अपर्याप्त नहीं मानी गई। प्रथम विश्व युद्ध के अंत के बाद मुंबई में मुकदमों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई। युद्ध के दौरान जहां केवल 500 वाद दायर होते थे, वह संख्या युद्ध के बाद लगभग 7000 हो गई। प्रोथोनोटरी को प्रतिदिन तीन न्यायाधीशों की सूची बनाना कठिन हो गया। इसी समय एक अतिरिक्त न्यायाधीश की माँग की गई और अनिच्छा से ही मंजूरी मिली। इस संकट काल में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सर नॉर्मन मैक्लियोड ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की जगह मामलों के त्वरित निपटारे को प्राथमिकता दी।

बॉम्बे हाईकोर्ट को अंतिम अपीलीय न्यायालय का दर्जा दिया गया था, जिससे यह सभी दीवानी और आपराधिक मामलों में निम्न अदालतों के फैसलों के विरुद्ध अंतिम अपील सुनने का अधिकार रखता था, सिवाय उन मामलों के जिन्हें प्रिवी काउंसिल के पास अपील के लिए भेजा जाता था।

प्रिवी काउंसिल, जिसे 1833 के अधिनियम द्वारा ब्रिटिश भारत के अंतिम अपीलीय न्यायालय के रूप में स्थापित किया गया था, के अधिकांश मामलों की उत्पत्ति भारत से ही होती थी। बाद में, भारतीय अनुभव रखने वाले न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को इसमें शामिल किया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट से सर रिचर्ड काउच, सर लॉरेंस जेनकिंस और सर जॉन बोमोंट जैसे प्रमुख न्यायाधीश तथा सर एंड्रयू स्कोबल, सर जॉर्ज लोंड्स, सर डीएफ मुल्ला और एम आर जयकर जैसे अधिवक्ता प्रिवी काउंसिल में नियुक्त हुए।

प्रारंभ में उच्च न्यायालय की बैठकें एडमिरल्टी हाउस, अपोलो स्ट्रीट में होती थीं, जो पहले रिकॉर्डर कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लिए उपयोग होती थी।

वर्तमान भवन का निर्माण अप्रैल 1871 में प्रारंभ हुआ और नवंबर 1878 में पूर्ण हुआ। यह भवन यूनिवर्सिटी बिल्डिंग और पब्लिक वर्क्स सचिवालय के मध्य स्थित है। इसकी लंबाई 562 फीट और चौड़ाई 187 फीट है। पूर्व की ओर ऊँचाई 90 फीट तथा केंद्रीय टावर 178.5 फीट ऊँचा है। यह भवन अंग्रेज़ी गोथिक शैली में कर्नल जे.ए. फुलर द्वारा डिज़ाइन किया गया था, जिसकी लागत ₹16,44,528 आई थी।

भवन में अद्भुत शिल्पकला देखने को मिलती है, जैसे दीवारों पर भेड़िए और लोमड़ियों के सिर जिनके गले में वकीलों के बैंड लटकते हैं। प्रथम और द्वितीय मंजिल पर बनी मूर्तियों में एक बंदर न्यायाधीश की मूर्ति विशेष ध्यान आकर्षित करती है, जो एक आंख पर पट्टी और हाथ में न्याय तराजू लिए हुए है। यह कहा जाता है कि एक पारसी ठेकेदार और यूरोपीय मुख्य ठेकेदार के बीच विवाद था, जिसका न्यायालय से हल नहीं निकला और ठेकेदार ने अपनी नाराज़गी भवन की मूर्तिकला में उतार दी।

न्याय की देवी की प्रतिमा भवन के पश्चिमी भाग पर स्थित है। वह आंखों पर पट्टी बांधे, एक हाथ में तलवार और दूसरे में न्याय का तराजू थामे खड़ी हैं। उनके सामने सिर झुकाए दया की देवी खड़ी हैं।

भारत से अंतिम अपील 15 दिसंबर 1949 को प्रिवी काउंसिल द्वारा निपटाई गई, जिससे भारत और प्रिवी काउंसिल के 200 वर्षों के संबंध का अंत हुआ। 26 जनवरी 1950 को भारत में नया संविधान लागू हुआ और सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई।

1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार भी विस्तृत हुआ। नागपुर और राजकोट में पीठें स्थापित की गईं। 1960 में गुजरात हाईकोर्ट की स्थापना के साथ राजकोट पीठ अलग हुई। 1981 में औरंगाबाद, और 1982 में पणजी (गोवा) में पीठें स्थापित की गईं। 1987 में गोवा राज्य बनने के बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र महाराष्ट्र, गोवा, और दादरा नगर हवेली तथा दमन दीव तक विस्तृत हुआ।

वर्तमान में, बॉम्बे हाईकोर्ट में कुल स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 94 है, और इसकी प्रमुख पीठें हैं:

– नागपुर पीठ 

– औरंगाबाद पीठ 

– गोवा पीठ

Source: https://ecommitteesci.gov.in/division/high-court-of-bombay/

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