Saranga Anilkumar Aggarwal v. Bhavesh Dhirajlal Sheth & Ors.
[2025] 3 S.C.R. 325
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 27 के तहत लगाया गया दंड, दिवाला और ऋण शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की धारा 96 के तहत लागू अंतरिम स्थगन (moratorium) की सीमा में नहीं आता। यह निर्णय उन विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जहाँ यह प्रश्न उठता है कि उपभोक्ता आयोग द्वारा दंडित किए गए आदेशों पर दिवालिया प्रक्रिया के चलते रोक लगाई जा सकती है या नहीं।
मामले में अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि चूंकि उनके विरुद्ध दिवाला कार्यवाही आरंभ हो चुकी थी और आईबीसी की धारा 96 के तहत अंतरिम स्थगन लागू था, अतः उपभोक्ता मंच द्वारा उन्हें दंडित करना और उसे लागू करना कानूनन वर्जित है। अपीलकर्ता ने यह भी दावा किया कि धारा 27 की प्रकृति आपराधिक है और इसे अन्य आपराधिक दायित्वों की भांति देखा जाना चाहिए, जिस पर मोराटोरियम लागू होता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 का उद्देश्य किसी वित्तीय ऋण की वसूली नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि धारा 79(15), आईबीसी के अनुसार ऐसे दंडात्मक दायित्व “excluded debts” (अपवर्जित ऋण) की श्रेणी में आते हैं, जिन्हें मोराटोरियम से बाहर रखा गया है।
इसके साथ ही, न्यायालय ने धारा 138, परक्राम्य लिखित अधिनियम, 1881 से की जा रही तुलना को भी असंगत बताया। कोर्ट ने कहा कि जहाँ धारा 138 का उद्देश्य वित्तीय दायित्व के उल्लंघन पर आपराधिक कार्रवाई करना है, वहीं धारा 27 उपभोक्ताओं के वैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए उपचारात्मक प्रवृत्ति की है। यह कोई ऋण वसूली नहीं, बल्कि उपभोक्ता के लिए अनुशासनात्मक सुरक्षा का साधन है।
इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि आईबीसी के अंतर्गत लागू मोराटोरियम का प्रभाव धारा 27 के तहत दी गई सजा या दंड पर नहीं पड़ता और ऐसे दंड लागू रहेंगे। यह निर्णय उपभोक्ताओं को एक महत्वपूर्ण संरक्षण प्रदान करता है और यह स्पष्ट करता है कि दिवाला कानून की प्रक्रिया उपभोक्ता न्याय व्यवस्था की कार्यवाही में बाधा नहीं बन सकती। न्यायालय का यह दृष्टिकोण उपभोक्ता अधिकारों की प्रभावशीलता और संवैधानिक संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।