सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वर्षों से घर का इंतजार कर रहे लाखों फ्लैट खरीदारों को मिली राहत

मामले एवं विश्लेषण

केस शीर्षक: सरंगा अनिलकुमार अग्रवाल बनाम भावेश धीरजलाल शेट्ठ व अन्य | [2025] 3 S.C.R. 325 | फैसला दिनांक: 4 मार्च 2025
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ का फैसला

यह मामला एक ऐसे बिल्डर से जुड़ा है, जिसने उपभोक्ताओं से पैसे लेकर तय समय पर फ्लैट्स नहीं दिए। नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रैसल कमीशन (NCDRC) ने बिल्डर पर सेवा में कमी के चलते 27 बार जुर्माना लगाया था। बिल्डर ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए इन जुर्मानों पर रोक लगाने की गुहार लगाई कि उसके खिलाफ दिवालियापन (IBC) की कार्यवाही शुरू हो चुकी है, और इसलिए उस पर “इंटरिम मोराटोरियम” यानी अस्थायी रोक लागू होनी चाहिए।

बिल्डर की दलील थी कि IBC की धारा 96 के तहत जब किसी के खिलाफ दिवालियापन की अर्जी दाखिल होती है, तब उससे जुड़े सभी मामलों पर रोक लग जाती है — इस आधार पर उसने NCDRC के आदेशों की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उपभोक्ता कानून के तहत लगाया गया जुर्माना केवल एक “ऋण” नहीं होता, बल्कि यह एक दंडात्मक और नियामकीय (regulatory) कार्यवाही होती है। अदालत ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 के तहत की गई कार्यवाहियाँ उस प्रकार की नहीं हैं जिन्हें IBC के मोराटोरियम के अंतर्गत रोका जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसा मान लिया जाए कि उपभोक्ता आयोग द्वारा लगाए गए दंडों को IBC की रोक से बचाया जा सकता है, तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। बिल्डर जैसे लोग दिवालियापन की आड़ में उपभोक्ता अधिकारों को दबा सकते हैं, जो कानून की मूल भावना के खिलाफ है।

जनता के लिए क्या मायने रखता है यह फैसला?

यह फैसला उन लाखों फ्लैट खरीदारों के पक्ष में है जो वर्षों से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि बिल्डर, चाहे उन पर दिवालियापन की कार्यवाही चल रही हो, उपभोक्ताओं से बच नहीं सकते। उपभोक्ता अदालतों द्वारा लगाए गए दंड और आदेशों को लागू किया जाएगा। इस फैसले से यह संदेश गया है कि उपभोक्ताओं के अधिकार सर्वोपरि हैं और कानून का सहारा लेकर उन्हें कमजोर नहीं किया जा सकता।


सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और बिल्डर को आदेश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर उपभोक्ता आयोग द्वारा लगाए गए सभी दंडों का पालन करें। इस ऐतिहासिक निर्णय ने उपभोक्ता अधिकारों को और मजबूत किया है और दिखा दिया है कि न्यायालय उपभोक्ताओं के साथ है।

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