सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला – अवैध याचिका दाखिल कर ऑरोविले परियोजना में बाधा डालने की कोशिश, याचिका खारिज कर ₹50,000 का जुर्माना लगाया गया

न्यायिक निर्णय

मामला: ऑरोविले फाउंडेशन बनाम नताशा स्टोरी
सिविल अपील संख्या: 13651 / 2024 |

पीठ: न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले


सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि अदालत में याचिका दायर करने वाला व्यक्ति यदि जरूरी तथ्यों को छुपाता है या झूठ बोलता है, तो ऐसी याचिका खारिज की जानी चाहिए। इस मामले में नताशा स्टोरी नाम की एक निवासी ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने ऑरोविले टाउन डेवलपमेंट काउंसिल (ATDC) में रेसिडेंट्स असेंबली द्वारा नामित सदस्यों को नियुक्त करने की मांग की थी।

यह याचिका इसलिए गलत पाई गई क्योंकि उसी विषय पर पहले से एक याचिका दाखिल कर खारिज हो चुकी थी, और इस दूसरी याचिका में उन्होंने यह जानकारी छिपाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जब संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय की असाधारण अधिकारिता का उपयोग करता है, तो उसे पूरी सच्चाई और सभी आवश्यक तथ्य सामने रखने होते हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर जरूरी तथ्य छिपाता है, तो उसकी याचिका पर सुनवाई ही नहीं होनी चाहिए।

इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि रेसिडेंट्स असेंबली या उसका कोई सदस्य ATDC जैसी समिति का अनिवार्य हिस्सा बनने का कानूनी अधिकार नहीं रखता। समिति बनाने का पूरा अधिकार केवल गवर्निंग बोर्ड को है।

  • याचिका में जरूरी तथ्य छुपाने पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की।
  • ₹50,000 का जुर्माना याचिकाकर्ता पर लगाया गया।
  • कोर्ट ने कहा कि यह याचिका केवल परियोजना में रुकावट डालने और संस्थागत कार्यों को बाधित करने के इरादे से दायर की गई थी।
  • ऑरोविले मास्टर प्लान पहले से केंद्र सरकार की स्वीकृति प्राप्त है और इसके कार्यान्वयन में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है।

यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने और विकास कार्यों में अनावश्यक रुकावटों को रोकने की दिशा में एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है।

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